Nishant Choubey

तुम्हारी यादें

तुम नहीं तो क्या तुम्हारी यादें तो हमारे साथ है ,
ऐसा लगता है मानो जैसे कल ही की बात है︱

धर रूप लक्ष्मी का घर हमारे आयी थी तुम ,
मेरे गोद में आकर पहली बार मुस्कुरायी थी तुम︱

बचपन की सारी बातें और तुम्हारी शरारतें ,
हमारा आपस में लड़ना और तुम्हारी शिकायतें︱

आँखें बंद करूँ तो सामने तुम मुस्कुराती हो ,
जितना ना सोचा था कभी उतना याद तुम आती हो︱

भले ना दिखाई दो आज भी बहुत पास हो तुम ,
पहले भी थी और आज भी बहुत ख़ास हो तुम︱

ख़ुशनसीब समझता हूँ खुदको तुम्हारा भाई मैं कहलाऊँगा ,
तुम्हारे हिम्मत के किस्से दुनिया को ज़रूर मैं बतलाऊँगा︱

सोचा था सारी उम्र एक दूसरे के साथ हम रहेंगे ,
हमेशा अपने इस परिवार का सहारा हम बनेंगे︱

अकल्पनीय दर्द में भी कैसे है हँसना तुम सिखा गई ,
जीना कैसे है सबको और कैसे मरना तुम दिखा गई︱

तुम्हारी बातों को यादकर हमेशा मैं मुस्कुराऊँगा ,
जैसा तुम चाहती थी वैसा जीवन मैं बिताऊँगा︱

सौ दिन या सौ साल इससे ज्यादा फर्क ना पड़ता ,
कालचक्र के सामने किसी का नामों -निशां ना रहता︱

खुश हूँ की तुमने अपना जीवन अच्छे से बिताया ,
खुद से जुड़े सभी रिश्तों को अच्छे से निभाया︱

खुश रहो जहाँ भी तुम हो बस यहीं मैं चाहता हूँ ,
हर जन्म तुम्हारा भाई बनूँ बस यहीं मैं माँगता हूँ︱

निशांत चौबे ‘अज्ञानी ’
१८.08.२०२०

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