॥शिवोहम॥

शून्य में है जो बसा
अनंत भी उसी में है ,
इस जगत का जो है आदि
अंत भी उसी में है ।
प्राणों में प्राण का संचार जिसने किया,
इस धरा में जीवन आधार जिसने दिया ।
महाप्राण है वहीं, वहीं महाकाल है
सूक्ष्म से भी सूक्ष्म और विकट विकराल है ।
वहीं तो है, वहीं तो है
शिवोहम , शिवोहम , शिवोहम ।

नीलकंठ, भुजंगधारी, चन्द्रमा जटाओ में,
भस्म तन पर लगा है गंगा शिखाओं में ।
मूंदे नयन और मंद मुस्कान में ,
बैठे है वो तो अपने ही ध्यान में ।
ललाट पर असंख्य सूर्यो का तेज व्याप्त है ,
पूर्ण है वो स्वयं में और स्वयं ही पर्याप्त है ।
पाशुपति, भोलेनाथ, कैलाश वासी है
आशुतोष , आदियोगी ,अक्षर अविनाशी है ।
वहीं तो है, वहीं तो है
शिवोहम , शिवोहम , शिवोहम ।

हलाहल विष को पी जो अमृत का दान दे,
कौन है शिव के सिवा सबको जो मान दे ।
ठुकराया जग ने जिसको पाते तेरी शरण,
और किसको मैं भजुँ छोड़ के तेरे चरण ।
स्वर जिसने दिया ये वंदना उसी की है ,
मैंने लिखा है पर ये रचना उसी की है ।
अस्तित्व का हमारे आधार भी वहीं तो है ,
लक्ष्य जीवन का और सार भी वहीं तो है ।
वहीं तो है, वहीं तो है
शिवोहम , शिवोहम , शिवोहम ।

निशांत चौबे ‘ अज्ञानी’
३१.०३.२०२२

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