Shikar se bhi unchi - Arunima Sinha Story

शिखर से भी ऊँची

 21 साल की अरुणिमा ने बड़े उम्मीद के साथ लखनऊ से दिल्ली जाने वाली पद्मावती एक्सप्रेस को पकड़ा और एक सपने के साथ उस पर सवार हो गई। आर्थिक तंगी के कारण वह जनरल डिब्बे में यात्रा कर रही थी । अरुणिमा ने पिछले 7 सालों से उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधित्व किया था, नेशनल वॉलीबॉल में, और सीआईएसफ में नौकरी पाने हेतु आज वह दिल्ली जा रही थी । अगले 5 मिनट में कुछ ऐसा हुआ जिसके बारे में उसने सपने में भी नहीं सोचा था।

 उसके डिब्बे में बरेली के आसपास कुछ चोर चढ़े और उन्होंने अरुणिमा के गले में  सोने का चेन देखा। जबरन उन्होंने उससे वह चेन छीनना चाहा परंतु वह भी  एक स्पोर्ट्स वूमेन थी, इतनी आसानी से अपना चेन कैसे छीनने  देती ? उनके बीच कुछ समय के लिए हाथापाई हुई और गुस्से में आकर उन लोगों ने अरुणिमा को चलती ट्रेन से बाहर फेंक दिया।

अरुणिमा दूसरी पटरी पर आती हुई ट्रेन से टकरा गई और कुछ ही सेकेंड में उसकी पूरी की पूरी  जिंदगी ही बदल गई। उसका एक पाँव ट्रेन से टकराने के कारण कट गया था और दूसरे पाँव की हड्डी चकनाचूर हो चुकी थी। खून से लथपथ तथा असहनीय दर्द में अरुणिमा चिल्ला चिल्ला कर मदद की गुहार कर रही थी, परंतु उस रात के अंधेरे में उसकी आवाज़ दब कर रह गई।अगर वह बेहोश हो जाती तो शायद उस दर्द को महसूस नहीं कर पाती परंतु वह पूरी तरह होश में थी और सब कुछ महसूस कर सकती थी। उसे पटरी पर फिर एक बहुत तेज कंपन महसूस हुई  और उसने एक ट्रेन को उसकी तरफ आता हुआ देखा। वह चाह कर भी अपना शरीर हिला नहीं पा रही थी।

 दोनों पटरियों के बीच में गिरे होने के कारण उस ट्रेन ने अरुणिमा को कोई क्षति नहीं पहुँचाई परंतु वह अंदर से हिल चुकी थी। तभी उसने देखा कि उस सुनसान जगह पर दो चूहे अचानक कहीं से आ गए और उसके सामने उसके पैर को, जो टूटा हुआ था, कुतर-कुतर कर खाने लगे। चिल्ला चिल्ला कर अब अरुणिमा की आवाज़ भी निकलनी बंद हो चुकी थी। इस तरह 7 घंटे और 49 ट्रेनों  के बाद सुबह की किरणों ने दस्तक दिया। कुछ लोगों ने देखा कि दूर रेलवे की पटरी पर एक लाश पड़ी है और उसके चारों तरफ खून ही खून बिखरा पड़ा है।

 उत्सुकता वश  लोग अरुणिमा के समीप गए और उसे जीवित अवस्था में देख उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। उन लोगों ने मिलकर उसे वहाँ के सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया। बहुत ज्यादा खून बहने के कारण तथा एनेस्थीसिया नहीं होने के कारण डॉक्टर उसके इलाज में कतरा रहे थे। अरुणिमा अभी भी होश में थी। उसने डॉक्टर की बातों को सुना। उसने डॉक्टर को बुलाया और कहा सर आप एनएसथीसिया की चिंता मत कीजिए उसके बिना ही आप मेरा पैर काट सकते हैं ।उसकी इस बात ने डॉक्टर और कंपाउंडर को विस्मित तथा भावपूर्ण कर दिया। उन दोनों ने अपना खून अरुणिमा को दिया और उसका ऑपरेशन किया। 12 अप्रैल 2011 को यह घटना घटित हुई थी। जब स्पोर्ट्स मिनिस्ट्री को यह बात पता चला तो उन्होंने अरुणिमा को ₹25000 मुआवजा देने का ऐलान किया जिसे लोगों के आक्रोश के कारण बढ़ा कर दो लाख कर दिया गया। 18 अप्रैल को अरुणिमा को एम्स दिल्ली में ट्रांसफर कर दिया गया। अरुणिमा अभी इससे उबर भी नहीं पाई थी कि उसे फिर एक और मानसिक आघात पहुंचा।

 एम्स में इलाज कराते हुए अभी 4 महीने भी नहीं हुए थे कि अरुणिमा ने अपने बारे में कई तरह के  अफ़वाह सुनना शुरू किया। अखबारों में उसके बारे में लिखा जाता कि वह बिना टिकट ट्रेन में सफर कर रही थी और टिकट मांगने के डर से चलती ट्रेन से कूद पड़ी। कभी  लिखा जाता कि उसने खुद आत्महत्या करने की कोशिश की। चीख चीख कर वह  लोगों को सच्चाई बताना चाहती थी, परंतु उसे पता था कि कोई उसकी बातों पर विश्वास नहीं करेगा। फिर अरुणिमा ने ऐसा संकल्प लिया जिसने फिर उसकी दुनिया को पूरी तरह से बदल दिया।

 अरुणिमा लोगों को दिखाना चाहती थी वह उनकी तरस का नहीं बल्कि उनके गर्व का हिस्सा बनना चाहती थी । उसने संकल्प लिया कि वह दुनिया के सबसे उच्चतम शिखर माउंट एवरेस्ट पर विजय प्राप्त करेगी। कब और  कैसे उसे पता नहीं, परंतु उसे इतना पता था  कि वह जरूर करेगी। अस्पताल से डिस्चार्ज होने के पश्चात घर ना जाकर वह उस महिला के पास पहुँची जिसे ‘ भारत की प्रथम महिला जिसने माउंट एवरेस्ट को जीता था ’ की उपाधि प्राप्त थी, बचेंद्री पाल। उन्होंने उसकी पूरी कहानी सुनी और अपनी आंखों की नमी के साथ उन्होंने कहा “ इस समय तुमने सोचा कि तुम्हें  माउंट एवरेस्ट पर विजय प्राप्त करनी है तुमने अपनी सोच से ही उस पर विजय प्राप्त कर ली, अब लोगों को दिखाना बस बाकी है।”

 माउंट एवरेस्ट पर विजय प्राप्त करने तथा चाहने में बहुत अंतर होता है और उस अंतर को दृढ़ निश्चय और कठिन परिश्रम के द्वारा ही भरा जा सकता है। बछेंद्री पाल के मार्गदर्शन में अरुणिमा ने अपना अभ्यास शुरू तो  किया पर प्रोस्थेटिक पैरों के साथ तालमेल बैठाने में शुरुआत में काफी दिक्कतें आई। इतनी मेहनत के कारण उसके पैरों से कभी-कभी खून निकल आता तथा फिर चलने फिरने जैसी आम चीजों को करने में भी असहनीय दर्द होता। अरुणिमा ने मानो जैसे दर्द से दोस्ती कर ली हो, उसने अपने दर्द को ही प्रेरणा बना लिया तथा फिर महीनों के कठिन अभ्यास के बाद उसके सपने को हकीक़त में बदलने का उसे मौका मिला।

 माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई करने में लाखों का खर्च आता है और अरुणिमा जैसे गरीब घर की लड़की इतना सारा पैसा कहाँ  से लाती। अरुणिमा के लिए टाटा फ़ाउंडेशन आगे आई और उसने अरुणिमा को स्पॉन्सर किया। अरुणिमा के मार्ग का सबसे बड़ा रुकावट, जो उसके हिसाब से पैसा था, अब वह दूर हो चुका था पर एवरेस्ट का सफर इतना भी आसान नहीं होता।

 जहां लोगों को चढ़ाई में 5 मिनट लगता था वहां अरुणिमा को 2 घंटे लग जाते थे। वह सोचती जब इतनी छोटी चढ़ाई में मुझे इतना समय लग रहा है तो मैं एवरेस्ट पर कैसे चढ़ूँगी ?  अरुणिमा की हालत को देखते हुए कोई भी शेरपा  उसके साथ चलने के लिए तैयार नहीं था। एवरेस्ट की चढ़ाई में हर पर्वतारोही के साथ एक शेरपा जाता है। आखिर में बहुत समझाने पर एक शेरपा उसके साथ चढ़ने  को राजी हुआ। धीरे-धीरे अपनी लगन और मेहनत से अरुणिमा ने अपनी चढ़ाई में सुधार किया और उसने एवरेस्ट के बेस कैंप से ऊपर चढ़ना शुरू किया। धीरे-धीरे अरुणिमा की कठिनाई भी बढ़ने लगी।

 अब अरुणिमा के आगे थी एवरेस्ट की सबसे कठिन चढ़ाई, जो  दूर से देखने में बेहद ही सुंदर लगती थी – हलके हरे रंग की बर्फ। जैसे अरुणिमा बर्फ पर पर अपना पैर रखती , उसकी चिकनाई के कारण उसका प्रोस्थेटिक पैर मुड़ जाता। वह सतह पर अपनी पकड़ बना ही नहीं पा रही थी। उसके शेरपा ने उससे कहा कि चलो वापस लौट चलते हैं परंतु अरुणिमा  ने ठाना था चाहे कुछ भी हो जाए उसे एवरेस्ट के शिखर पर  चढ़ना ही  है। घंटों की मशक्कत के बाद अरुणिमा एवरेस्ट के आख़िरी कैम्प तक पहुंची, जहाँ से आगे की चढ़ाई एक रस्सी की मदद से करनी होती थी। तभी एक नई चुनौती ने दस्तक दिया।

 इतनी ऊंचाई पर ऑक्सीजन की मात्रा बहुत कम हो जाती है, जिसके कारण पर्वतारोही अपने साथ ऑक्सीजन सिलेंडर साथ लेकर चलते हैं। अब अरुणिमा के सिलेंडर में ऑक्सीजन की मात्रा कम हो गई थी,  जिसके कारण आगे की यात्रा संभव नहीं थी। इतनी दूर पहुँचकर और इतने पास आकर भी, अब भी वह मंज़िल से बहुत दूर थी- करीब 500 मीटर। बड़ी मुश्किल से अरुणिमा ने यह फंड जुटाया था, शायद अगली बार उसे फिर वापस आने का मौका ना मिले । उसने शेरपा को बहुत समझाया, काफी मिल्लते की और आखिर में उसे मना लिया। चूँकि दिन में चढ़ाई  खतरनाक होती है, मौसम की वजह से, उन्होंने रात में शिखर की चढ़ाई शुरू की। तभी अरुणिमा ने ऐसा दृश्य देखा जिसके कारण उसकी आंखों से आँसू निकल गए।

 बहुत सारे लोग एवरेस्ट की चढ़ाई  पूरी नहीं कर पाते और रास्ते में या वापस लौटते समय अपना दम तोड़ देते हैं।  जिस रस्सी को पकड़कर अरुणिमा आगे बढ़ रही थी  उसके दोनों और उसे लाशें ही लाशें दिखाई दे रही थी।आगे  कुछ दूर पर एक हाथ रस्सी को पकड़कर लटक रहा था जो एक बांग्लादेशी पर्वतारोही का था जिसने अरुणिमा के साथ ही अपने सफर की शुरुआत की थी। अरुणिमा की आंखों में आँसू थे,  उसने उस आदमी को लाँघते  हुए, क्योंकि कोई दूसरा रास्ता नहीं था, संकल्प लिया कि वह इन सभी लोगों के लिए शिखर पर विजय प्राप्त करेगी।अरुणिमा अपने लक्ष्य  की तरफ  आगे बढ़ रही थी तभी उसने ऐसा कुछ सुना जिसने उसके बढ़ते कदम को रोक दिया ।

शिखर से कुछ दूरी पर ही अरुणिमा के  ऑक्सीजन सिलेंडर से बीप -बीप की  आवाज़ आने लगी जिसका मतलब था उसका सिलेंडर कभी भी खत्म हो सकता था। शेरपा ने फिर उसे वापस लौटने को कहा परंतु अब अरुणिमा को बस एवरेस्ट की चोटी दिखाई दे रही थी। ठीक 10:55 पर 21 मई 2013 को अरुणिमा के कदम विश्व के सबसे उच्चतम शिखर के ऊपर थे। वह आज शिखर से भी ऊंची हो गई। उसने शेरपा  को कहा कि मेरा वीडियो बनाओ। शेरपा उसे समझाता रहा कि ऑक्सीजन कभी भी खत्म हो सकता है,  हम जल्दी चलते हैं परंतु जैसे अरुणिमा को यह आभास हो गया था कि वह एवरेस्ट से  जिंदा वापस नहीं जा पाएगी। वह उस लम्हें को पूरी तरह जीना चाहती थी और लोगों को यह दिखाना चाहती थी कि लगभग 2 वर्ष पहले जो उसके जीने पर संदेह कर रहे थे, सोचते थे कि यह जिंदगी भर दूसरों पर आश्रित रहेगी, आज एवरेस्ट उसके कदमों के नीचे हैं। 5 मिनट बाद जैसे ही अरुणिमा ने वापस लौटने के लिए कदम बढ़ाए वह लड़खड़ाकर गिर पड़ी, उसका ऑक्सीजन लगभग खत्म हो गया था। बस कुछ ही क्षण में उसकी जीवन यात्रा समाप्त ।

 शेरपा अरुणिमा को छोड़कर जैसे ही वापस मुड़ा तो उसने देखा वहाँ  एक ब्रिटिश पर्वतारोही चढ़ने की कोशिश कर रहा था । खराब मौसम के कारण व कुछ दूरी पर जाकर लौट गया पर  जाते-जाते अपना ऑक्सीजन सिलेंडर,  जो  उसके पास अतिरिक्त था, वहीं छोड़ गया ।  शेरपा तुरंत भागकर सिलिंडर पास पहुँचा और उसे देखा तो उसके चेहरे पर मुस्कान तैर गई । उसके जान में जान आ गई । इसे चमत्कार कहे या अरुणिमा का भाग्य, 11:00 बजे के बाद एवरेस्ट पर चढ़ाई करने का मतलब है सीधे मौत को निमंत्रण। आमतौर पर इस समय वहाँ  कोई भी नहीं जाता। उधर अरुणिमा के आँखों के सामने अँधेरा छाने लगा, उसके हाथ से उसके साँसों  की डोर छूटती जा रही थी। जैसे ही उसे लगा बस यह आख़िरी साँस,  वैसे ही शेरपा ने उसे ऑक्सीजन सिलिंडर लगाया ।  सिलेंडर में पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन थी जिसकी मदद से अरुणिमा के साँसों में साँस आई । ख़ुशी के मारे शेरपा और वह जोर जोर से रोने फिर हँसने लगे । इतनी देर हो जाने के कारण लोगों को लगा था कि अरुणिमा कभी वापस नहीं आएगी।उसने अपने हिम्मत, संघर्ष और भाग्य की मदद से असंभव को संभव कर दिखाया।

 माउंट एवरेस्ट पर विजय के बाद अरुणिमा ने एक के बाद एक विश्व के सातों महाद्वीपों के सबसे ऊँचे शिखर पर अपने नाम का और अपने देश का झंडा फहराया । किसी को पूरी उम्र लग जाती है एक शिखर पर पहुंचने के लिए परंतु अरुणिमा ने एक उम्र में ही अपने कद की ऊंचाई को विश्व के सभी शिखरों की ऊंचाई से ऊंचा कर दिया। जीवन हमारे साथ क्या करती है, यह  हमारे बस में भले ही ना हो परंतु हम जीवन के साथ क्या करते हैं यह पूरी तरह हमारे वश में ही है। अरुणिमा इसका जीवंत उदाहरण है।


निशांत चौबे ‘अज्ञानी ’

०७. ०६. २०२० 

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