निष्फल जीवन

“ बाँझ “, “निष्फल ”, “व्यर्थ ”

थिम्मा को रोज यह शब्द अपने परिवार तथा अन्य लोगों से सुनना पड़ता था । विवाह के एक वर्ष उपरांत लोगों ने पूछना शुरू किया कि कब खुशख़बरी सुनाओगी  परंतु आज 25 वर्षों के बाद भी उसके घर में वह खुशी की खबर नहीं पहुँची । वह जिस समाज में रहती थी वहाँ बिन बच्चों की मां को बहुत ही हीन दृष्टि से देखा जाता था । रोज-रोज के तानों से तंग आकर थी थिम्मा ने सोचा कि जब मैं ही नहीं रहूँगी तो वह किसे  ताना सुनाएँगे । उसने आत्महत्या करने का निर्णय लिया ।

थिम्मा  का पति चिकैया  उसे बहुत प्यार करता था । दोनों पढ़े-लिखे नहीं होने  के कारण अपने गांव हुलिकल में, जो कर्नाटक के जिले में पड़ता था, मजदूरी कर अपना गुजारा करते थे । शादी के तीन वर्ष के बाद ही  उन्हें पता चला कि थिम्मा कभी माँ  नहीं बन पाएगी । बड़े दुःखी मन से उस दंपत्ति ने इस सच्चाई को स्वीकारा और अपने जीवन का यापन करने लगे। चिकैया का मन आज काम में नहीं लग रहा था , वह आधे दिन की छुट्टी ले दोपहर में ने घर पहुँचा और उसने जो सपने में भी नहीं सोचा था उसकी आँखों ने उसे वैसा दृश्य दिखाया ।

 उसने देखा कि थिम्मा झोपड़ी की छत पर रस्सी लगा उससे  लटकने जा रही थी ।  चिकैया  जोर से भाग  कर थिम्मा  के पास पहुंचा और उसे गले लगा कर फूट-फूट कर रोने लगा । थिम्मा भी उसके सीने से लग कर रो रही थी । आत्महत्या का कारण जाने के बाद कुछ देर  तो चिकैया  ने कुछ भी नहीं कहा फिर अचानक ही उसने ऐसा कुछ कहा जिसने उन दोनों की जिंदगी को पूरी तरह बदल कर रख दिया ।

चिकैया  के गांव हुलिकल में बरगद के बहुत बड़े-बड़े पेड़ पाए जाते थे । उसने थिम्मा से कहा कि “ ईश्वर ने हमें कोई  संतान नहीं दी  परंतु संतान के सुख से वह हमें दूर नहीं रखेंगे।  थिम्मा  हमारा जो पड़ोसी  गांव है, जहाँ से होकर सड़क जाती है , वहाँ  जाकर हम बरगद के पेड़ लगाएँगे  और अपने बच्चों की तरह उसका देखभाल करेंगे ।”  थिम्मा  को चिकैया  का सुझाव बहुत पसंद आया और अगले ही दिन दोनों ने मिलकर एक छोटा सा बरगद का पौधा लगाया ।

 थिम्मा और चिकैया  ने प्रथम वर्ष दस बरगद के पौधे सड़क के किनारे लगाए । रोज जाकर उन्हें पानी देते,  उसके आसपास कटीली झाड़ियाँ भी उन्होंने लगा दी ताकि उन पौधों को कोई नुकसान नहीं पहुँचाए । वह दोनों मानसून के समय पौधों को लगाते ताकि उन्हें पानी की कमी ना हो । अगले वर्ष उन्होंने और 15 पौधे लगाए,  फिर अगले वर्ष 25 । देखते ही देखते उनके बच्चों की संख्या 385 तक पहुंच गए। बरगद के अलावे  उनके परिवार में और भी वृक्ष थे तथा  कुल मिलाकर भविष्य में उनके बच्चों की संख्या 8000 हो गई । 

चिकैया और थिम्मा का साथ 55 वर्षों तक रहा । 30 वर्षों में उन्हें जितना भी पैसा मिलता,  उन पैसों से वे अपने बच्चों की देखभाल करते और उनकी  संख्या बढ़ाते। लोगों ने थिम्मा का नाम बदलकर या कहें बढ़ाकर ‘सालूमरदा थिम्माक्का’ कर दिया। ‘सालूमरदा’ कन्नड़ भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है ‘ वृक्षों की कतार’ और ‘अक्का’ का अर्थ ‘दीदी’। अपने पति के मृत्यु के पश्चात भी सालूमरदा ने वृक्षारोपण करना नहीं छोड़ा।  दक्षिण भारत के अधिकांश किताबों में उनका जिक्र भी आता है।  उम्र के एक सौ सातवें पड़ाव पर ऐसा कुछ उन्होंने किया कि पूरी दुनिया उनके बारे में बात करने लगी। 

सालूमरदा के कामों को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री देने का ऐलान किया ।  जब सालूमरदा का नाम राष्ट्रपति भवन में पुकारा गया तो तालियों की गड़गड़ाहट और थिम्माका की भाव-भंगिमा  ने सभी का मन मोह लिया।  हाथ जोड़े हुए उन्होंने राष्ट्रपति से पुरस्कार लिया और एक माँ  के स्वभाव से आशीर्वाद के तौर पर राष्ट्रपति के सर पर हाथ रख दिया ।  वहां बैठे सभी लोग खासकर प्रधानमंत्री तथा जितने भी लोग उसका प्रसारण देख रहे थे उनके चेहरे पर एक मुस्कान तैर गई । अगले ही दिन सारे लोग उस बूढ़ी औरत के बारे में बात करने लगे जिसने राष्ट्रपति को ही अपना आशीर्वाद दे डाला।  लोग अब थिम्माक्का को ‘वृक्ष माता’ कहने लगे। 

 जो औरत लगभग 60 वर्ष पूर्व बच्चे के अभाव के कारण अपनी जीवन यात्रा समाप्त करना चाहती थी आज वह एक नहीं लगभग 8000 बच्चों की मां है।  गांव के लोग जो उन्हें ताना मारते थे आज उनकी बढ़ाई  करते नहीं थकते।  उनका गांव आज थिम्माक्का के कारण ही विश्व पटल पर चिन्हित है।  शारीरिक और मानसिक कष्टों पर हमारा कुछ प्रभाव नहीं है,  उनके बारे में हम कुछ नहीं कर सकते । हर एक व्यक्ति के जीवन में यह आते जाते रहते हैं परंतु दुःख पूर्णतः हमारे हाथ में है । जीवन की परिस्थितियों को हम कैसे देखते हैं यह पूर्णतः  हम पर ही निर्भर करता है किसी और पर नहीं । 

सालूमरदा थिम्माक्का की अपनी कोई संतान नहीं,  जीवन भर वह “बाँझ ” या “निष्फल” ही रही परंतु उसका जीवन निष्फल नहीं था । 


निशांत चौबे ‘अज्ञानी’

 १७.०५.२०२०

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