असाधारण इच्छाशक्ति

अपने कमरे में बैठा गोग्गिंस बाहर खिड़की से पेड़ों के गिरते हुए पत्तों को देख रहा था। उसकी आँखों से गिरते हुए आँसू सूरज की रौशनी में उसके गाल पर मोतियों के समान चमक रहे थे। आठ साल के बच्चे आमतौर पर हँसते- बोलते रहते है मगर गोग्गिंस का बचपन साधारण बच्चों की भाँति नहीं था।

अभी अभी उसके पिता और उसकी माँ के बीच में लड़ाई हो रही थी , उसके पिता उसकी माँ को अपने बेल्ट से मार रहे थे। गोग्गिंस से जब बर्दाश्त नहीं हुआ तो वो अपनी माँ को बचाने आया और उसके पिता ने उसे भी बेल्ट से खूब पीटा। उसके पिता के गुस्से का कारण, गोग्गिंस के कानों में तेज़ दर्द हो रहा था और उसकी माँ ने उसे हॉस्पिटल ले जाकर उसका इलाज करवाया तथा इलाज में पैसे खर्च हुए। 

गोग्गिंस के पिता रोलर स्केट का क्लब चलाते थे और अपने दोनों बच्चों से वहाँ पर काम करवाते थे। दिन में स्कूल और पूरी रात बच्चें क्लब में काम करते थे।  कुल मिलाकर हम यह कह सकते है कि गोग्गिंस के पिता अपने परिवार को परिवार न समझ कर नौकर समझते थे और उनके ऊपर ना अपना समय और ना ही अपना धन खर्च करना चाहते थे।

उसकी माँ उस वक़्त कमरे में आयी, उसने गोग्गिंस को अपने सीने से लगाया  और उसके कानों में कुछ कहा।

ठीक एक हफ़्ते बाद अपने पड़ोसी की मदद से गोग्गिंस और उसकी माँ उस नरक से भाग निकले, जिसे उसके पिता ने बनाया था। इस बीच गोग्गिंस के भाई ने उनके साथ चलने से इंकार कर दिया और अपने पिता के घर में ही रहना उसने पसंद किया। अभी उस नरक से निकलने की ख़ुशी पूरी तरह से मिली भी नहीं थी कि फिर एक नई समस्या ने जन्म ले लिया – गरीबी। 

गोग्गिंस की माँ अपने पति का क्रेडिट कार्ड ले कर आयी थी और उसको जैसे ही पता चला कि दोनों भाग निकले है, उसने उस क्रेडिट कार्ड को बंद कर दिया। नया देश, नए लोग।  ऐसा कोई भी नहीं था जो उनकी मदद करे। कई-कई दिन बिना कुछ खाए ही निकल जाते थे।  

धीरे-धीरे गोग्गिंस की माँ ने कुछ छोटी-मोटी कामों को करना शुरू किया और सरकार की गरीबी योजना के अंतर्गत आने वाले कुछ पैसों से माँ-बेटे ने अपना गुजारा शुरू किया। अब गोग्गिंस ने वापस अपनी पढ़ाई , जो बीच में छूट गई थी, शुरू की। 

एक बहुत ही गंभीर समस्या ने उसके जीवन में फिर दस्तक दिया।   

दरअसल उसकी बचपन की कठिनाइयों का प्रभाव गोग्गिंस के मस्तिष्क पर बहुत गहरा पड़ा। अपने पिता से मिलने वाले डाँट और मार तथा उसके बाद झेली हुई गरीबी के कारण वो अब हर वक़्त तनाव में रहने लगा। इसी तनाव के कारण उसका दिमाग किसी भी चीज पर अपना ध्यान नहीं दे पाता था। 

उसे अपने हमउम्र बच्चों के साथ बात करने और खेलने में बड़ी परेशानी होने लगी , जिसके कारण वो अब लोगों से दूर रहने लगा। पढ़ाई पर भी वो अपना ध्यान नहीं लगा पाता था ,उसे कुछ समझ में ही नहीं आता कि क्या पढ़ाया जा रहा है। कक्षा में उसके सबसे काम अंक आते और वो चुपचाप एक कोने में ही बैठा यह सोचते रहता कि वापस अपने घर कब जाऊँगा। 

टीचरों ने उसकी माँ को बुलाया और बताया की इस तरह वो उसे अपने स्कूल में नहीं रख सकते और अगर गोग्गिंस ने कोई सुधार नहीं दिखाया तो उसे हम इस स्कूल से निकाल देंगे। गोग्गिंस ने इस समस्या को वही समाधान निकाला जो वह उस समय निकाल सकता था – नकल।

 उस समय तो यह तरकीब काम कर गई परन्तु इसके कारण आने वाले समय में उसे काफी परेशानी झेलनी पड़ी।        

हुआ यह कि नकल करके गोग्गिंस किसी तरह अपनी सारी कक्षाओं को पास करता रहा पर इस बीच जो असल में पढ़ाई होती है वो बहुत पहले ही छूट चुकी थी।  वो अब अपना स्कूल खत्म कर चुका था परन्तु अब तक उसे  ठीक से पढ़ना भी नहीं आता था। 

आगे की पढ़ाई के बारे में उसने सोचा ही नहीं। लोगों से उसने पहले ही बहुत दूरी बना ली थी। अपने जीवन की परेशानियों से निपटने के लिए गोग्गिंस ने खाने को अपना हथियार बनाया।  जब-जब उसे निराशा होती , जो उसे अक्सर होती थी , उसने मीठा खाना शुरू किया। कभी चॉकलेट , कभी पेस्ट्री या आइसक्रीम और कभी चिप्स। उसके खाने का असर उसके सेहत पर पड़ने लगा और देखते ही देखते उसका वजन बढ़कर 135 किलो तक पहुँच गया। 

अपने जीविकापार्जन के लिए गोग्गिंस ने वही पेशा चुना जो उसके अनुकूल हो – पेस्ट किलिंग । दिन भर गोग्गिंस सोता और रात में जब सब सो चुके होते वो घूम-घूम कर कीड़े – मकौड़ो और चूहों को मारता।  इस तरह उसका जीवन व्यतीत हो रहा था। 

 एक सुबह कुछ ऐसा हुआ जिसने गोग्गिंस का जीवन पूरी तरह से बदल कर रख दिया। 

एक सुबह अपनी शिफ्ट करने के बाद गोग्गिंस अपने घर पहुँचा और उसने अपना टीवी चालू किया।  फिर वह नहाने चला गया।  यह उसके रोज का रूटीन था।  टीवी पर अमेरिका के “ नेवी SEAL” की ट्रेनिंग दिखाई जा रही थी।  गोग्गिंस उसे ध्यान से देखने लगा। 

 कहते है की यह ट्रेनिंग दुनिया के सबसे कठिन ट्रेनिंग में गिनी जाती है। इसमें जो सबसे कठिन होता है उसे “ हेल वीक” कहते है, जिसमें छह दिनों तक ट्रेनी को सिर्फ दो या तीन घंटे सोने दिया जाता है और उनसे कई कठिन कामों को करवाया जाता है। ज्यादातर लोग बेल बजाकर इस ट्रेनिंग को छोड़ देते है। गोग्गिंस वही देख रहा था कि कैसे मिट्टी, बालू तथा पसीने से सने और पानी से भींगे लोग एक एक कर अपनी हार मान रहे थे। 

उसने अब यह ठाना कि चाहे जो हो जाए मुझे “नेवी SEAL” बनना है। गोग्गिंस के पास तीन महीने का समय था और  एक बहुत बड़ी समस्या।  

गोग्गिंस का वजन उस समय 135 किलो था और ट्रेनिंग के लिए ज्यादा से ज्यादा वजन 85 किलो ही सकता था। उसे तीन महीने में 40 किलो वजन कम करना था। गोग्गिंस ने अपने खान-पान और अपने शरीर पर पूरा ध्यान दिया।  रोज सुबह ४:३० बजे उठता , २ घंटे साइकिल चलाकर जिम जाता , फिर २ घंटे वहाँ व्यायाम करता।  उसने जंक फूड खाना बिलकुल छोड़ दिया।

 रोज सुबह बिस्तर से उठने का मन नहीं करता था फिर भी उसने यह ठाना कि अगर कुछ उसकी ज़िंदगी को बदल सकता है तो वह यही ट्रेनिंग प्रोग्राम है। गोग्गिंस ने अपना पूरा ध्यान इस ट्रेनिंग पर लगा रखा था और यह ठान  लिया कि या तो वह अपना वजन घटा प्रोग्राम में शामिल होगा नहीं तो इस दुनिया से विदा लेगा। उसके आँखों के सामने और कुछ भी दिखाई नहीं देता था।

 एक महीने में गोग्गिंस ने अपना वजन १५ किलो कम कर लिया और फिर अपने लक्ष्य पर दुगने उत्साह से काम करने लगा। तीन महीनों में उसने अपना वजन 135 से घटाकर 84 किलो तक कर लिया। पहली बार उसे लगा कि वो निकम्मा नहीं है और अपनी ज़िंदगी में वह भी कुछ कर सकता है।

  खैर ज्यादा दिनों तक उसकी इस ख़ुशी ने उसका साथ नहीं दिया। 

गोग्गिंस ने “नेवी SEAL” की ट्रेनिंग में दाख़िला तो ले लिया मगर पिछले तीन महीने की कमर-तोड़  मेहनत ने कारण अब शरीर ने जवाब देना शुरू कर दिया। ट्रेनिंग आगे बढ़ती रही और शरीर दिन प्रतिदिन कमजोर पड़ता रहा , फिर भी गोग्गिंस ने हार नहीं मानी और किसी तरह “ हेल वीक ” तक पहुँच गया।  

अब उसके शरीर ने पूरी तरह जवाब दे दिया और उसे निमोनिया हो गया। चूँकि गोग्गिंस ने खुद से उस ट्रेनिंग को नहीं छोड़ा उसे वापस फिर एक और मौका दिया गया , शुरुआत से शुरू करने के लिए।

 इस बार गोग्गिंस ने दुगने जोश के साथ ट्रेनिंग में भाग लिया और अपने दिए कामों को पूरा करने लगा। ऐसा लग ही रहा था कि सबकुछ ठीक हो रहा है उसके घुटने का  कैप  फ्रैक्चर हो गया।  इस डर से की कहीं उसे दुबारा ना निकाल दिया जाए उसने यह बात किसी को बताई नहीं और अपनी ट्रेनिंग करता रहा। किसी तरह उसने “हेल वीक ” भी निकाल लिया। आगे ट्रेनिंग में सबको उसके घुटने के बारे में पता चल गया तथा उसे आगे ट्रेनिंग नहीं करने दिया गया।

 गोग्गिंस की हिम्मत और सहनशक्ति को देखते हुए उन लोगो ने उसे एक आखिरी मौका फिर दिया।  इस बार गोग्गिंस की किस्मत ने उसके राह में कोई रूकावट नहीं डाली और गोग्गिंस ने अव्वल दर्जे से उस ट्रेनिंग को पास कर लिया। जिस “ हेल वीक ” से एक बार भी गुजरना कोई नहीं चाहेगा , उसी को गोग्गिंस ने एक साल में तीन बार पार किया।  ऐसा करने वाला वह दुनिया का एकमात्र इंसान है।  

गोग्गिंस ने फिर अफग़ानिस्तान युद्ध में भी भाग लिया। फिर अपने मारे गए साथियों के लिए फंड जुटाने हेतु उसने दुनिया के सबसे कठिन मैराथन – “ बैड वाटर 135 ” में भाग लिया और उसे पूरा भी किया। इस मैराथन की कहानी भी दिलचस्प है।  

इस मैराथन में भाग लेने के लिए गोग्गिंस को एक दूसरे मैराथन में भाग लेना था जिसमें उसे 100 मील की दूरी एक दिन में पूरी करनी थी।  उससे पहले गोग्गिंस ने पहले किसी मैराथन में भाग नहीं लिया था। बिना किसी ट्रेनिंग के उसने इस मैराथन में भाग लिया और 70 मील पूरा होते होते उसका शरीर खून से पूरा लथपथ हो चुका था। अत्याधिक श्रम कारण उसका मूत्राशय नियंत्रण उससे छूट गया और उससे  खून की पेशाब हो गई।  फिर भी उसने बचे हुए 30 मील को खत्म किया और रेस को 19 घंटों में पूरा।

गोग्गिंस की माने तो जबसे उसने कष्टों से दोस्ती करनी सीख ली तबसे उसकी ज़िंदगी बदल गई है।  हम आमतौर पर कष्टों से भागना चाहते है पर इसके साथ साथ हम ज़िंदगी से भी दूर होते चले जाते है। आसान रास्ता शुरू में तो बहुत अच्छा लगता है , हमारे काम भी बनते है परन्तु आगे चलकर वही हमारे दुःखों का कारण भी बन जाते है। गोग्गिंस ने कठिनाइयों को गले से लगाया और एक हारे हुए इंसान से खुद को बदलकर दुनिया का सबसे कठिन आदमी बना दिया। 

आप किस का इंतज़ार कर रहे है ? 


निशांत चौबे ‘अज्ञानी’

१२.०४. २०२० 

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