गुजर जाएगा

दर्द की ये स्याह रातें गुजर कभी तो जाएँगी
हर्ष की वे श्वेत किरणे इधर कभी तो आएँगी ,
जिस तरह गुजरा है सुख, दुःख भी गुजर जाएगा
लेकिन सिर्फ चलने वाला ही मंजिल अपनी पाएगा ।

मंजिल अभी तक मिली नहीं तो चलना क्यों छोड़ दूँ ?
हार अभी तक हुई नहीं है तो लड़ना क्यों छोड़ दूँ ?
क्यों छोड़ दू उम्मीद की कल अच्छा सब हो जाएगा
खोटा ही सही पर किस्मत एक दिन चल जाएगा ।

भले थक कर शरीर चूर हो उठना तो पड़ेगा
अपनी हक़ की ख़ुशी के लिए लड़ना तो पड़ेगा ,
जो आज रूठा है तुझसे कब तक वो रूठ पाएगा
संघर्ष तेरा देख के खुद आसमां भी झुक जाएगा ।

निशांत चौबे ‘अज्ञानी’
२१.०७.२०१९

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