विश्वास

विश्वास जब स्वयं का स्वयं पर डगमगाता है ,
मनुष्य परिस्थितियों की कठपुतली बन जाता है ।
अपने अनुरूप फिर वह उसे नचाती है ,
कभी यहाँ तो कभी वहाँ उसे घुमाती है ।
स्वयं अपना मार्ग देख नहीं वो पाता है ,
देख दर्पण वो स्वयं से आँखे चुराता है ।

क्यूँ हम आश्रित दूसरों पर हो जाते है ?
उनकी बातों को सुनकर व्यर्थ में घबराते है ।
क्यूँ दूसरे हमें स्वयं से बेहतर जानते है ,
उनकी बातें हम आँख मूंदकर मानते है ।
क्या मुझसे बेहतर कोई मुझे जान सकता है ?
मेरे अंदर के सामर्थ्य को पहचान सकता है ।

मुझे स्वयं पर अब विश्वास करना होगा ,
अपनी अंतःशक्ति का आभास करना होगा ।
असंभव जो दिखता है , संभव वो हो जाएगा ,
मेरा वर्तमान सुनहरे भविष्य को सजाएगा ।
विश्वास के पथ पर चलकर ही मंजिल नजर आएगी ,
और अपने हाथों से मुझे वो वरमाला पहनाएगी ।

विश्वास जब स्वयं का स्वयं पर जगमगाता है ,
मनुष्य परिस्थितियों का स्वामी बन जाता है ।

निशांत चौबे ‘अज्ञानी’
१६.११.२०१८

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