लाखों ने अपनी जानें दी

लाखों ने अपनी जानें दी कि
हम आज़ाद भारत देख सके ,
उन आँखों की पहली और
उनकी आखिरी चाहत देख सके ।

उन आँखों को तो दिखा नहीं
मगर अगली पीढ़ी को दिखा गए ,
मातृभूमि पर अभिमान और
बलिदान की सीख सिखा गए ।

खून की एक एक बूँद अपनी
इस देश के ऊपर वार दी ,
उसकी उजड़ी हुई तस्वीर को
अपने हाथों उन्होंने सँवार दी ।

अपनी जवानी को कैसे जीना है
सरे जवानों को बतला गए ,
और भारतियों की शौर्य गाथा
पूरी दुनिया को दिखला गए ।

इतिहास में भले ही जगह ना मिली
लोगों के दिलों में घर कर गए ,
आजाद भारत की मजबूत नींव हेतु
हँसते-हँसते अपने सर धर गए ।

ना धन का लोभ , ना पदवी
और ना ही शोहरत की इच्छा ,
उन बेसब्र आँखों को तो थी बस
आज़ाद भारत के सुबह की प्रतीक्षा ।

आज़ादी तो आई परन्तु
आज़ाद भारत उन्हें भूल गया ,
उन हसरत भरी आँखों ने
खुदगर्जी का चुभा वो शूल गया ।

क्या इतना भी नहीं बनता कि
याद उनकी अपने दिलों में रखी जाए ,
उनकी बलिदान और शौर्य गाथा को
हर पीढ़ियों के समक्ष पढ़ी जाए ।

जो हुआ वो बदल नहीं सकता
मगर इतना बीड़ा आज हम उठाए ,
उन देशभक्त शहीदों को
उनके हक़ का सम्मान हम दिलाए ।

निशांत चौबे ‘अज्ञानी’
०४.०५.२०१९

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