ये कहाँ आ गए हम

कभी प्रकृति की गोद में
खेला करते थे हम ,
आज प्रदूषित धुँए से
सभी का घुटता है दम ।

कहाँ से चले थे और ,
ये कहाँ आ गए हम ।

कभी नदियों के स्वच्छ जल
कंठ की प्यास बुझाते थे ,
और पक्षियाँ अपने स्वर में
मधुर गीत दुहराते थे ।
आज पीने का साफ पानी
बहुतों को बस यही है गम ,
कहाँ से चले थे और ,
ये कहाँ आ गए हम ।

कभी बिछौना धरती को बना
हम आकाश ओढ़ा करते थे ,
अपने आसपास के लोगों को
हम खुद से जोड़ा करते थे ।
अब अपने में ही जीते लोग
दुनिया का उनको कैसा गम ,
कहाँ से चले थे और ,
ये कहाँ आ गए हम ।

कभी आपस में हम
शांतिपूर्वक रहा करते थे ,
अपने मतभेदों को हम
बातचीत से हल करते थे ।
आज कहीं चलती है गोली
और कहीं फूटते है बम ,
कहाँ से चले थे और ,
ये कहाँ आ गए हम ।

ज़हर घुला हवाओं में और
प्रकृति खून के आँसू रोती है ,
देख अपनी दुर्दशा को वो
अपना तन-मन गम में डुबोती है ।
और कितने ग़मों को झेलेगी
क्या इतना नहीं है कम ,
कहाँ से चले थे और ,
ये कहाँ आ गए हम ।

जिस कोख से जन्म लिया
उसी को चोट पहुँचाते हम ,
अपनी ही गलतियों को
बस बार बार दुहराते हम ।
विकास के प्रयत्न में
विनाश को भा गए हम ,
कहाँ से चले थे और ,
ये कहाँ आ गए हम ।

निशांत चौबे ‘अज्ञानी’
२६.०२.२०१९

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