मेरे कृष्णा

घाट-घाट का पानी पीकर
आया तेरे दर पर ,
प्यासा है तन, प्यासा है मन
प्यासा मेरा जीवन
सूखे कंठ की प्यास बुझा
अधरों पर मुस्कान सजा
मेरे कृष्णा ….. कृष्णा ।

तुझसे जो नाता है मेरा
आकर के मुझे बता ,
अब तक भटका बहुत हूँ मैं
आकर के राह दिखा ,
जीवन सपना है या सपना
जीवन में ढलता है ,
मैं कुछ करता हूँ या सिर्फ
तू ही सबकुछ करता है |
मेरे कृष्णा ….. कृष्णा ।

क्या सबकुछ मैं तुझपे छोड़ूँ
या खुद पे सब ले लूँ ,
आखिर कैसे करूँ समर्पण
खुद को कैसे भूलूँ ,
मुझको अपना मीत बना
इन शब्दों को गीत बना
मेरे कृष्णा ….. कृष्णा ।

निशांत चौबे ‘अज्ञानी’
२८.०७.२०१६

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