एक रंग की हो चुकी हूँ

तीन रंगो में लिपटकर
आई थी अर्थी तेरी ,
तब से केवल एक रंग
की मैं हो चुकी हूँ ।

अब तलक छूटी ना मेहंदी
हाथों में जो रची थी ,
मेहंदी लगाने का हक़
भी मैं खो चुकी हूँ ।

क्या तेरे कसमें वो वादे
क्या कोई तुझसे गिला है ,
खून तेरा धरती माँ के
खून से जा मिला है ।

अब तलक शहनाईयों की
गूँज फैली है फ़िज़ा में ,
विरह की उस वेदना को
भी मैं गा चुकी हूँ ।

शौर्य के सारे वो तगमें
और उनकी वो कथाएँ,
तेरे जाने के बाद बस
वही हिम्मत बढ़ाए ।

याद है तूने कहा था
मुझसे बढ़कर देश है ,
अब वही तो सहलाती
तेरे केश है ।

तेरी चाहत तेरी उल्फत
सीने में रखकर यूँही ,
तुझको खोकर आज खुद में
तुझको मैं पा रही हूँ ।

इस ह्रदय की वेदना को
कब तक मैं छिपाती,
इसलिए इस गीत को
आज मैं गा रही हूँ ।

निशांत चौबे ‘अज्ञानी’
०६.०८.२०१६

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