वो इंसान कहाँ है ?

खुद को जलाकर औरों को उजाला दे
खुद भूखा रहकर औरों को निवाला दे ,
मंझधार में डूबते को किनारा दे
जीवन से जूझते को सहारा दे ,
वो इंसान कहाँ है ? कहाँ है ? कहाँ है ?

क्या तुमने देखा है उस इंसान को
शायद वो तुम्हारी नज़र में आया हो ,
श्वेत और स्याह पन्नो से निकलकर
शायद यथार्थ के पटल पर मुस्कुराया हो ,
खुद दर्द सहकर औरों को दवा दे
आँसू सीने में भरकर औरों को हँसा दे ,
पैसों को नहीं रिश्तो को मोल दे
किसी बेज़ुबां के होठों को बोल दे ,
वो नादान कहाँ है ? कहाँ है ? कहाँ है ?

इतिहास के गर्त से शायद वो आ जाए
या वर्तमान के पत्र से नभ पर छा जाए ,
ना धर्म का बंधन उसे जकड़े
ना जात की ज़ंज़ीरे ,
ना धन का लोभ उसे पकड़े
ना वासना की तस्वीरें ,
खुद को भूलकर औरों को राह दिखाए
भटके मुसाफिरों के गंतव्य का गाह बताए ,
जीवन की मदमस्त मदिरा में चूर हो
दुनिया के प्रलोभनों से दूर हो ,
वो अनजान कहाँ है ? कहाँ है ? कहाँ है ?

शायद उसने रचा है मुझको
या मैं उसका रचयिता हूँ ,
शायद मेरे गीतों में है वो
या मैं उसकी कविता हूँ ,
खुद के आचरण से औरों को जीना सिखाए
परमार्थ के परिश्रम में खुद का पसीना बहाए ,
बलवानो को जो बुद्धि दे
पापियों को जो शुद्धि दे ,
अज्ञानियों को जो ज्ञान दे
तिरस्कृतों को जो मान दे ,
इस संसार को जो स्वर्ग बनाए
इस धरा पर जो धर्म बढ़ाए ,
वो भगवान कहाँ है ? कहाँ है ? कहाँ है ?

निशांत चौबे ‘अज्ञानी’
२६.१२.२०१५

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