मौत से ठन गई है मेरी

मौत से ठन गई है मेरी
कि अब मैं हार नहीं मानूँगी ,
इस घनघोर अँधेरे में तुझे ऐ ज़िन्दगी
मैं कहीं से भी ढूँढ निकालूँगी |

ज़िन्दगी डॉक्टर के कलम की स्याह नहीं
वो तो मेरे अंदर मौजूद है ,
ये सिर्फ मैं ही तय करुँगी की
उसका मुझमे कब तक वज़ूद है |

माना कैंसर बहुत बड़ी है
पर मुझसे बढ़कर वो नहीं है ,
तेरे कदमो की आहट सुनाई देती है
खुशियाँ , मुझे पता है तू यहीं कहीं है |

अपने पैरो पे चलकर आई थी
अपने पैरो पर चलकर जाऊँगी ,
अपने अंदर की हिम्मत से
असंभव को संभव बनाऊँगी |

दर्द तू कितना भी ज़ोर लगाले
मेरी हिम्मत को नहीं तोड़ पायेगा ,
कदम जो मंजिल पर चल पड़े है
उनको तू कभी न मोड़ पायेगा |

दुःख की इस अँधेरी रात में
सुख का सूरज ज़रूर निकलेगा ,
मेरे इस प्रचंड तपस्या से
कैलाश का हिम भी ज़रूर पिघलेगा |

जितनी सांसे लिखकर आई थी
ज़िंदादिली से उसे जीकर जाऊँगी ,
मैं अपने इस संघर्ष से खुदको
औरो के लिए प्रेरणा बनाऊँगी |

मेरी इस तपस्या का परिणाम
बहुत जल्द ही सबको दिखेगा ,
मेरे शरीर के अंदर फैला कैंसर
बहुत जल्द ही जड़ समेत मिटेगा |

निशांत चौबे ‘ अज्ञानी ‘
१०.११.१८

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