ज़मीन की चादर

ज़मीन घास की खुरदरी चादर ओढ़े सोया था ,
अपने अतीत के मीठे स्वप्नों में खोया था |

तभी उषा की पहली किरण ने उसे सहलाया ,
और कोयल की मीठी कूक ने उसे पास बुलाया ।

परन्तु अब भी उसे अपनी नींद प्यारी थी ,
पर जगाने की उसे सारी कोशिशें जारी थी ।

शीतल हवा ने प्यार से उसका चादर हटाया ,
जमीं ने झिझट कर खुद वो वापस उसमे घुसाया ।

काफी कोशिशों के बाद भी जब उसने ना मानी ,
तब सूरज ने उसको सबक सिखाने की ठानी ।

उसने प्रचंड गर्मी से चादर को झुलसाया ,
और जमीं से स्वतः ही अपना चादर हटाया ।

निशांत चौबे ‘अज्ञानी’
०४.०१.२०१६

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