सूरज

प्रचंड अग्नि सा धधकता
प्रकाश का पुँज हो ,
इस समस्त धरा को जीवन दे
ऐसे अखंड ऊर्जा के कुँज हो ।

काल रथ पर निरंतर गतिमान
निष्काम कर्म के विधान हो ,
संसार में सर्वोच्च कर्मयोग के
एक अद्भुत निशान हो ।

बिना किसी पक्षपात के
सब पर प्रेम लुटाते हो ,
अपने उज्जवल प्रकाश किरणों से
धरा से अन्धकार मिटाते हो ।

तुमसे ही सबकुछ है
तुमसे ही पृथ्वी का आधार है ,
इस समस्त प्रकृति के प्राणों का
बस तुमसे ही व्यापार है ।

अतः नमन है तुम्हें
तुम्हारा हमपर बहुत आभार है ,
इस धरा ही हर पीढ़ी
बस तुम्हारी ही कर्ज़दार है ।

निशांत चौबे ‘अज्ञानी’
१७.०१.२०१८

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