शिव

कैलाश पर्वत पर जा के
अपना धाम बनाया ,
ताज माया के बंधन को
वैराग्य अपनाया ।

दुनियां पीछे-पीछे भागे
काया और धन-वैभव के,
भस्म लगा के तन पे अपने
अलग ही अलख जगाया ।

अमृत पाने के हेतु जब
सागर मंथन था जारी ,
उसमे से ही निकला था
वो हलाहल विष भारी,
नीलकंठ बन कर उससे
तूने ब्रह्माण्ड बचाया ।

प्यासी धरती की व्याकुल
आत्मा की तृप्ति में ,
भगीरथ ने किया था तप
अपनी पूर्ण भक्ति में ,
गंगा के प्रचंड वेग को
अपनी शिराओं में धारा ,
फूट पड़ी उनसे फिर अमृतमय
जल की पावन धारा,
सूखे कंठ रिक्त ह्रदय के
जलन का ताप मिटाया ।

जब-जब संकट आन पड़ी तो
सबने नाम तेरा बोला,
क्षण भर में खुश हो जाता
है कितना तू भोला ,
जब-जब पाप बड़ी धरा पर
तांडव रूप फिर धारा ,
कितने ही असुरो से तूने
धरती को है तारा ,
तीसरी नेत्र को खोल के
मन के असुर जला डालो ,
अपने तप के तेज ताप से
मन के पाप तपा डालो ,
‘अज्ञानी’ने महिमा सुनकर
इतना है आस लगाया ।

निशांत चौबे ‘अज्ञानी’
१८.०२.२०१५

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