रण

बरसो से सोया था वो
सिंह दहाड़ उठा है ,
छेड़ा है तुमने जिसे वो
नाग फुँकार उठा है ।

बरसो से दबी जनता
आज हुँकार उठी है ,
भारत की सोई जवानी
अब पुनः जाग उठी है ।

ब्राह्मणो में लुप्त था जो
दिव्य ज्ञान जाग उठा है ,
क्षत्रियों से शस्त्रो से
वही पुराना आग उठा है ।

धरती के गर्भ में पलता
लावा धधक रहा है ,
कालिया नाग के दमन हेतु
अब कृष्ण मचल रहा है ।

जगा सकते हो पौरुष तो
कायरता पर तुम चोट करो ,
अनीति पर टूट पड़ो
अधर्म पर विस्फोट करो ।

वरना मूक दर्शक सा तुम
कोने में खड़े हो जाओ ,
निरीह कीट का जीवन जी
काल के ग्रास हो जाओ ।

महाभारत का रण है ये
अर्जुन तुम गांडीव उठाओ ,
बहुत हो चुकी संधि वार्ता
अब अमोघ अस्त्र चलाओ ।

दुस्शासन और दुर्योधन का
भीम तुम संघार करो ,
उनके रक्तो से अब तुम
द्रौपदी का शृंगार करो ।

महाराणा , शिवाजी जैसे
देशभक्ति की ललकार बनो ,
अंग्रेजो के छक्के छुड़ाए
वो टीपू की तलवार बनो ।

परिणाम की परवाह ना कर
वीर अब तुम युद्ध करो ,
अपनी वसुधा के कलंको को
रक्तो से अब शुद्ध करो ।

निशांत चौबे ‘ अज्ञानी ‘
०९.०५.२०१३

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nishantchoubey

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