यथार्थ

पलक झपकते दुनिया बदल जाए
पलट जाए ये जीवन,
बहुत सरल है विनाश करना
कठिन बड़ा है सृजन ।

बरसों लग जाते है मनुष्य को
जिस घरौंदे को बनाने में ,
मात्र एक पल लेती है प्रकृति
उसे ध्वस्त कर मिटाने में ।

अपनी शक्ति से उन्मत्त हो वो
चाहता है सबको वश में करना ,
पर्वतों को चाहे काट गिराना
अथवा रेत से सागर को भरना ।

अपनी मर्जी के मुताबिक
जितना चाहा उतना किया शोषण ,
संहार को आतुर है वो माँ
जिसने किया था उसका पोषण ।

अपनों से दुर्बल के समक्ष
मनुष्य जोर है लगाता ,
बलवानो के समक्ष खुदको
बस बेबस है पाता ।

दुर्बलों की इज़्ज़त करना
और बल से भयभीत ना होना,
गर सीख ले बस इतना वो
तो फिर पड़ेगा कभी ना रोना ।

प्रकृति के मूक संवाद को
गर हम समझने लग जाए ,
स्वर्ग से सुन्दर ये धरा
और भी सुन्दर बन जाए ।

अन्यथा, उसके बल से समक्ष
विवश हो पड़ेगा रोना ,
मौत के तांडव से फिर
बचेगा ना कोई कोना ।

निशांत चौबे ‘अज्ञानी’
१०.०५.२०१५

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