मुझको फिर से लोरी सुनाओ

मुझको फिर से लोरी सुनाओ
पास बुलाके गले से लगाओ ,
प्यार से मेरे सर को अपने
गोदी में रखकर जरा सहलाओ ।

ये जीवन उपकार तुम्हारा
क्या-क्या यत्न करके है पाला ,
पहला निवाला तूने खिलाया
ऊँगली पकड़कर चलना सिखाया ,
पहले अक्षर का ज्ञान भरा
मान भरा सम्मान भरा ,
मेरी पहली गुरु तुम हो
देवी तुम हो ईश तुम हो ,
आँखों को मेरे सुकून पहुँचाओ
अपना चेहरा फिर से दिखाओ ।

आँखों के दर्पण में सूरत तेरी
मन की गली में मूरत तेरी ,
नाजो से मुझको पाला तूने
चरित्र को मेरे ढाला तूने ,
स्नेह की वर्षा में भींगा बचपन
पलक झपकते फिर आया यौवन ,
चरणों में तेरे जब सर झुकता
कैसे बताऊँ मैं क्या पा जाता ,
ममता की अमृत मुझको पिलाओ
हाथों से अपने भोजन खिलाओ ,
तोहफे के रूप में मेरी इन
पंक्तियों को जरा अपनाओ ।

निशांत चौबे ‘ अज्ञानी ‘
१०.०३.२०१५

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