ममता की प्यास

माँ क्या होती उनसे पूछो
जिनके पास माँ नहीं होती ,
माला बनने की सारी हसरतें
आँखों की मोतियाँ, बिखरकर खोती।

एक उम्र गुजर जाती है
खुद को सँभालने में ,
जिनको नहीं मिल पाती है
माँ की लोरियाँ पालने में ।

लाखों के होने पर भी
खुद को अकेला ही पाती है ,
माँ को तलाशती नज़रे जब
बस तलाश कर रह जाती है ।

एक आह उठती है दिल में
और घुट कर रह जाती है ,
जब दूसरी माओं की उँगलियाँ
अपने बच्चो को सहलाती है ।

आँखे बंद करने पर
पास नज़र वो आती है ,
ज्यूँ छूने को हाथ बढ़ाओ
अदृशय वो हो जाती है ।

ममता की वर्षा के बिन
मन के सारे फूल मुरझाए है ,
इन अधरों को भी याद नहीं
पिछली बार , कब वो मुस्काए है ।

मन की यादों की वास्तविकता
शायद, शायद में बता पाता,
अपना सब कुछ न्यौछावर कर माँ
काश, काश तुम्हें बुला पाता ।

रोज़ इस बात का जश्न मनाओं
कि तुम्हारी माँ तुम्हारे पास है ,
वरना कईयों को तो अब तक
माँ की ममता की प्यास है ।

निशांत चौबे ‘अज्ञानी’
२९.०६.२०१६

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