मंज़िल

बैठ न यूँ निराश होकर,
विचलित न हो धैर्य खोकर |

तुझे संघर्ष अभी और है करना,
जीत का आखिरी हुँकार है भरना |

याद रख ! तू यहाँ जीतने है आया,
खोने को साथ कुछ भी ना लाया |

क्या हुआ ? जो सपने टूट गए ,
रेट बनकर मुट्ठी से छूट गए |

इतना कमज़ोर नहीं हो सकता तू ,
ज़िन्दगी से मुँह नहीं फेर सकता तू |

मन में आशादीप जलाये जा ,
नित नए सपने सजाये जा |

सपनो को हकीकत में बदलना है ,
बुज़दिली छोड़ हिम्मत को जकड़ना है |

अपनी जीत की कहानी अब तू लिखेगा ,
ज़िन्दगी को फिर ज़िंदादिली से जियेगा |

उठ अब . दौड़ अपनी मंज़िल के पीछे ,
रुकना तब , जब हो वो पैरों के नीचे |

निशांत चौबे ‘ अज्ञानी ‘
०७.०७.२०१०

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