बूँद

आकाश से गिरी एक बूँद जब चली ,
थोड़ी सी हिचकिचाई और थोड़ी सी वो डरी ।

जाना था बादलो के पार अब उसे ,
अनजाने रास्तो पे घर बार से परे ।

जाने क्या होगा आगे किसको है खबर ,
दिल में उसके उठता शंकाओ का लहर ।

अपनों से बिछड़कर आगे वो बढ़ी ,
रास्तो के मुश्किलों से खुद वो लड़ी ।

हवाओं के थपेड़ो ने किया परेशान,
कभी इधर कभी उधर थी वो हैरान ।

अकेले ही सहती गई चुपचाप ,
आँखों में थे आँसू पर मन में थी आस ।

भविष्य में क्या होगा पता ना उसे ,
वर्तमान में ही अब वो रमे ।

नजरिया थोड़ा बदला अपना उसने ,
चुनौतियों को माना मीत उसने ।

हवाएँ अब उसे ना करे परेशान ,
पंख बना भरे वो सपनो की उड़ान ।

जितनी मुश्किलें थी आसान बन गई ,
सपनों के उड़ान में अब वो रम गई ।

तभी उसने देखा धरती एक विशाल ,
नदियाँ, जंगल थे और थे पहाड़ ।

अपनी मंजिल को वो ना जानती ,
किसमें वो मिलेगी ना पहचानती ।

मगर मंज़िलो की उसे ना फ़िकर,
जाने क्या होगा आगे उसे ना खबर ।

लेकिन इन लम्हो को उसने जी लिया ,
जीवन अमृत उसने पी लिया ।

बाहें फैलाये मंज़िल को पा गई ,
मिलान की घड़ी अब तो आ गई ।

नन्ही सी बूँद अब नदी बन गई ,
एक नए सफर पर फिर वो चल पड़ी ।

तभी उसने देखा इक प्यासा ,
कंठ उसके सूखे आँखों में आशा ।

प्यार से हाथों में उसके समा गई ,
तृप्ति बनकर उसकी वो मोक्ष पा गई ।

निशांत चौबे ‘ अज्ञानी ‘
१७.०५.२०१४

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