दौड़

ज़िन्दगी की दौड़ में
इतनी दूर आ पहुंचे हम ,
अब ना किसी का साथ है
और ना किसी का गम |

सोचा साथ रहेगा हमेशा
पहले थोड़ा कर लूँ काम ,
अपनों की चिंता छोड़
जग में कर लूँ अपना नाम |

डूब गए काम में इतना
रहा ना कुछ ख्याल ,
ढूंढती रही हमें उनकी आँखे
लेकर मन में सवाल |

छोटी- छोटी खुशियों पर
गया ना कभी ध्यान हमारा ,
बड़ी ख़ुशी की आस में
गुजर गया ये वक़्त सारा |

आ पहुंचे उस मक़ाम पर
चारो ओर बस नाम हमारा,
पर इन थके कंधो को अब
नहीं है अपनों का सहारा |

कर दिया खुद ही हमने
अपनों को अपने से दूर ,
नहीं दिया अपना प्यार उन्हें
हो गई हमसे कैसी भूल |

जीवन के अनमोल पलों को
यूँ व्यर्थ ना गवाओ,
हमारी इस गलती को अब
तुम ना दुहराओं |

निशांत चौबे ‘ अज्ञानी ‘
२६.०८.२०१०

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