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तू बढ़ता चल

लहरों से जो डर गया तू
समंदर के मोती कैसे मिलेंगे ?
बिन मेहनत बे लगन से
जीत के फूल कैसे खिलेंगे ?

गर आसमां में है मंजिल
तो उड़ने की तू ताकत रख ,
धरती से ऊपर उठने का
हौसला रख आफत रख ।
इन तूफानों से अपने
पंखो को तू मजबूत बना ,
गरज-गरज कर अपने धुन से
बादल को तू जरा डरा ।

मंझधार में है नौका तेरी
अब तू ही इसको पार लगा ,
हार के इस अंधियारे में
अपनी विजय की लौ जला ।
दूसरो की खोज में तू
क्यों खुद से ही है जुदा,
किससे आस लगाए बैठा
तू खुद अपना है खुदा ।

जो कुछ है बस अभी का पल है
आज है पर ना कोई कल है ,
तू क्यों रुका , तू क्यों थमा
तू क्यों सहमा सा है खड़ा ,
होगी मंजिल कदमो पे तेरी
पहले अपना तू कदम बढ़ा ।

सबकुछ है तेरे भीतर
तू अपनी खोज में जरा निकल ,
गर कोई साथ ना दे तो
स्वयं अकेला तू बढ़ता चल ।

निशांत चौबे ‘अज्ञानी’
०१.११.२०१६

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nishantchoubey

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2 Comments

  • Your poetry inspires me so much and every word is itself a masterpiece.

    Simple appreciation is not enough for your work…you deserve much more than this.

    • Sahej, I am grateful that my poetry inspires you. Your appreciation motivates me to further improve and become better. Again thank you so much for your kind words.