तुझको मैं भुलाए हूँ

काम क्रोध मद लोभ में फँसकर
तुझको मैं भुलाए हूँ ,
अपने हाथों बेड़ी बनाकर
खुदको उसमें फँसाए है ।

दोष किसको आखिर दूँ मैं
सारा दोष तो मेरा है ,
अपनी ही कमियों के कारण
दुःखों का सब फेरा है ।

जानकर के इन बातों को
फिर भी इनसे क्यूँ अनजान,
अपने हाथों ही क्यूँ आखिर
घुट-घुट मरता है इंसान ।

नर से नारायण बनने की
शक्ति सबमें समाई है ,
जो अपने भीतर रहता है
उससे ही क्यूँ जुदाई है ।

पल-पल कटते कटते सारा
वक़्त यूँही कट जाएगा,
आँखों में पलते सपने के
साथ ही तू जाएगा ।

क्या कुछ कर सकता था तू पर
क्या कुछ तूने है किया ,
जीवन अमृत ठुकराकर के
अपने हाथों विष है पिया ।

जो कुछ बीता बीत गया वो
शोक ना कर आगे तू बढ़,
अपने भीतर झाँक रे बन्दे
खुद से अब खुद ही तू लड़ ।

कुरुक्षेत्र है जीवन तेरा
महासमर हरदम है चलता ,
कृष्ण भी तू है अर्जुन तू ही
दुर्योधन तुझमे पलता ।

जीत की माला किसको मिलेगी
इसका चयन तू ही करता ,
अपने कर्मों में बांधकर ही
भोग उसको तू है मरता ।

इस जीवन में अर्थ भरो तुम
समय को ना व्यर्थ करो तुम ,
ज्ञान की जोत और कर्म की शक्ति
पा उनको कर सच्ची भक्ति ।

निशांत चौबे ‘ अज्ञानी’
२३.०५.२०१४

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