ढूँढ़ता हूँ

सूनी – सूनी गलियों में
रहने का ठिकाना ढूँढता हूँ ,
गम के इस भँवर में
जीने का बहाना ढूँढता हूँ |

लाखो के भीड़ में
एक इंसान ढूँढ़ता हूँ ,
कुरबान हो गैरो पर
ऐसा नादान ढूँढता हूँ |

जले देशभक्ति की ज्वाल जिसमे
ऐसा सीना ढूँढता हूँ .
सींचे धरती को जो
ऐसा पसीना ढूँढता हूँ |

हथियारों के बीच मैं
अब शांति ढूँढता हूँ,
झकझोर दे युवाओ को
ऐसी क्रांति ढूँढता हूँ|

हिला दे आतंकियों को
ऐसी ललकार ढूँढता हूँ,
फाड़ डाले सीना उनका
वो हुँकार ढूँढता हूँ |

उबाल हो खून में
वो रवानी ढूँढता हूँ,
काम आये देश पर
वो जवानी ढूँढता हूँ|

बुज़दिलो के बीच में
आज आज़ाद ढूँढता हूँ,
मिटटी के ढेर में
मैं फौलाद ढूँढता हूँ |

भारत की तरक्की हो
ऐसी राह ढूँढता हूँ,
मर मिटे देश पर
वैसी चाह ढूँढता हूँ |

निशांत चौबे ‘ अज्ञानी ‘
२७.०९.१०

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nishantchoubey

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