जोत

ईश्वर कि गोद में
नन्ही सी जोत ,
बोली उनसे
हाथों को जोड़ ।

आपको छोड़कर
जाऊँ कैसे ?
जीवन के बोझ को
उठाऊँ कैसे ?

सहारा लेकर
क्यूँ मैं जियूँ ?
अमृत को छोड़ क्यूँ
विष को पियूँ ?

जीवन के कष्टों को
क्यूँ मैं सहूँ ?
किस्मत के हाथों फिर
क्यूँ मैं बहूँ ?

जन्म लेकर फिर
क्यूँ मैं मरूँ ?
पग-पग पर फिर
क्यूँ मैं डरूँ ?

मुस्कुराकर फिर
उन्होंने कहा ,
जोत के मन में
प्रकाश भरा ।

कैसे सोचा कि
तुमको मैं छोड़ ,
भेज दूँगा अपने
मुँह को मैं मोड़ ।

तुम्हारे संग मैं
सदा रहूँगा ,
माँ बाप का मैं
रूप धरूँगा ।

माँ-बाप के दिल में
मेरी छवि ,
उनके स्नेह में
ना होगी कमी ।

माँ के दूध में
मिलेगी तृप्ति ,
पिता के गोद में
मिलेगी शक्ति ।

धीरे-धीरे फिर तुम
स्वयं बढ़ना ,
अपने हाथों से
खुद को गढ़ना ।

जीवन के कष्टों से
स्वयं लड़कर ,
सोने की भाँति फिर
निखरना तपकर ।

प्रेम ही प्रेम हो
यही ईच्छा ,
जीना हर इक पल
यही शिक्षा ।

जोत से ज्वाला बन
आना मेरे पास ,
जीवन की यात्रा
बड़ी है खास ।

निशांत चौबे ‘ अज्ञानी’
०३.०६.२०१४

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