गिर के उठना

बार-बार गिर के उठना
जीवन की कहानी है ,
हार के बाद जीत की
रीत बढ़ी पुरानी है ।

किससे आस तू लगाए है
तू खुद अपना मसीहा है ,
सबसे ज्यादा जो काम आए
तेरे मेहनत का पसीना है ।

घुटने टेक , सर झुकाए
क्यूँ बैठा है हार के ,
इतनी जल्दी बेबस हो गया
तू किस्मत के मार से ।

अभी तो बस शुरुआत है
युद्ध और भयंकर होगा ,
यूँ शस्त्र डाल देने से
पराजय नित निरंतर होगा ।

युद्ध अवश्यंभावी है
जय-पराजय लगा रहेगा ,
जब तक हाथों में शस्त्र है
मान तेरा बना रहेगा ।

मन को अपना ढाल बना
ये कोई कमजोरी नहीं ,
हिम्मत बना तू इसे अपनी
ये तेरी मजबूरी नहीं ।

तू तब तक लड़ता रह
जब तक सांसों में साँस है ,
जब तक तू हार ना मानेगा
तब तक जीतने की आस है ।

याद रख अपने कर्मो का
भुगतान करता तू यहाँ ,
जो कुछ भी होता साथ तेरे
स्वयं लिखता तू यहाँ ।

कोई दोष नहीं है किस्मत का
ना समय बुरा होता कभी ,
अपनी गलतियों के कारण ही
मँझधार में फँसा तू अभी ।

तू स्वयं सारथी है अपना
तू स्वयं अपना है खेवनहार ,
ताज अपनी दुर्बलताओं को
स्वयं अपना बन तारणहार ।

स्वाभिमान से भरा मस्तक
चरित्र में धर्म की उज्ज्वलता ,
प्रचंड ऊर्जा समाई हो तन में
और मन में हिम की शीतलता ।

योद्धा के तन में
साधु का वास हो ,
जीवन कुछ ऐसे जियो कि
ज़िन्दगी को तुमसे आस हो ।

निशांत चौबे ‘ अज्ञानी ‘
३०.०५.२०१४

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