गिरना बहुत आसान है

गिरना बहुत आसान है
मुश्किल बहुत है चढ़ना ,
हार जाना आसान है
मुश्किल बहुत है लड़ना ।

हाथ से छूटा पत्थर
अपने आप है नीचे जाता ,
मगर परिश्रम द्वारा ही
उसे ऊपर है उछाला जाता ।

गुरुत्व बल से अपने आप
उल्काएँ आसमान में गिरती है ,
मगर मात्र एक रॉकेट
अरबो का खर्च लिए फिरती है ।

जल की धाराएँ बहकर
स्वयं ही नीचे आती है ,
पर्वतो का सीना चीर
सागर में समाती है ।

पता है मुझे तुम
ये पहले से जानते हो ,
अपने आप को ज्ञानी
तुम सबसे मानते हो ।

मगर एक छोटी सी बात
तुम्हे याद दिलाता हूँ ,
जो तुम्हे पता है
वही बात दुहराता हूँ ।

बुराइयों में अपना एक
गजब का आकर्षण होता है ,
उसके गुरुत्व बल के कारण
हमेशा ही घर्षण होता है ।

एक चुम्बक की तरह
अपने से आकर्षित करती है ,
तुम्हारी सारी राहों को
अपनी ओर परिवर्तित करती है ।

अपनी तीव्र प्रवाह में
तुम्हे बहा ले जाती है ,
अपनी ऊष्मा के ताप में
तुम्हे तपा दे जाती है ।

अनेको रूप धरकर तुझे
अपने जाल में फँसाती है ,
फिर वश में कर अपने
उँगलियों पर नचाती है ।

क्षणिक सुख की खातिर फिर
जीवन भर का दुःख झेलता ,
सब पता होते हुए भी
इंसान हमेशा खुद से खेलता ।

बड़ा सहज होता है
बुराइयों के दलदल में धँसना,
एक नीरीह जानवर की भाँति
उसके घातक पंजो में फँसना ।

बुरा बनना कोई बड़ी बात नहीं
हर कोई बुरा बन सकता है ,
नदी के बहते तेज धार में
एक मुर्दा भी बह सकता है ।

मगर प्रचंड तूफानों में भी
जो अपने पैरों पर खड़ा रहे ,
सच्चा इंसान वही है जो
अपनी बुराइयों से खुद लड़ा करे ।

उठ का गिरना , गिर कर उठना
ये सब तो है चलता रहता ,
मगर जीत उसी की होती
जो अंत तक है लड़ता रहता ।

रावण भी तुम्हीं हो
और तुम्हीं हो श्रीराम ,
जब तक एक का अंत न होगा
तब तक ना होगा युद्ध विराम ।

सरल ,कठिन दो राहों में
किसी एक को चुनना होगा ,
मन और अंतरात्मा में से
किसी एक को सुनना होगा ।

बहुत कर चुके साधारण काम
अब आसाधारण करने की बारी है ,
तप की अग्नि में जलकर देखो
फिर विजयश्री केवल तुम्हारी है ।

निशांत चौबे ‘ अज्ञानी’
०७.११. २०१३

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