Retro microphone on stage in restaurant. Blurred background

गा रहा हूँ मैं

जो उसने दिया है मुझको
उसी को मैं लौटा रहा हूँ ,
जिसने लबो को बोल दिए
गीत उसी के गा रहा हूँ ।

आखिर क्या है मेरा
जिसका मैं दंभ भरूँ,
अहंकार सीने में लिए
धरती को रौंदता चलूँ ।
उसकी दी आवाज़ को ही
मैं तुम्हे सुना रहा हूँ ,
जिसने लबो को बोल दिए
गीत उसी के गा रहा हूँ ।

हर क्षण उसकी अनुभूति
दिल के कोने में होती है ,
उस वीरान बंज़र सतह पर
प्रेम के बीज बोती है ।
उसके दिए संगीत को ही
अपने सुरों से सजा रहा हूँ ,
जिसने लबो को बोल दिए
गीत उसी के गा रहा हूँ ।

उसकी सारी क्रियाओं का
बस साधन मात्र हूँ मैं ,
उसके विश्व विद्यालय का
एक अबोध छात्र हूँ मैं ।
जो थोड़ा बहुत ज्ञान है मुझको
वो ही तुम्हे बता रहा हूँ ,
उसके प्रेम के पुष्पों से
दिल के घरौंदे सजा रहा हूँ ।

वर्तमान में खुदको खोकर
अब खुदको ही पा रहा हूँ ,
जिसने लबो को बोल दिए
गीत उसी के गा रहा हूँ ।

निशांत चौबे ‘अज्ञानी’
०२.०७.२०१६

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nishantchoubey

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