गम

क्यूँ अपने गम को तू
इतना बड़ा है समझता ,
क्या पर्वत के आगे
तूफ़ान कभी है ठहरता ।

क्या संग तू लाया था
जिसके खोने का गम है ,
क्या है तेरा अपना
आँखे फिर क्यूँ नम है ।

गिर के उठना ही तो
जीवन की है कहानी ,
जीना तो है उसी का
जिसने हार ना मानी ।

रात कितनी हो काली
फिर सवेरा है होता ,
सूरज के किरणों से
धुलकर अँधेरा है खोता ।

फिर क्यूँ आँखो में अपने
अँधेरे को तू है बसाए ,
सुबह की किरणें तो
खड़ी है पलकें बिछाए ।

गम ही तेरा तो तुझको
खुशियों का मोल बताता ,
गम के काँटों पे चलकर
खुशियों की राह तू पाता ।

कष्टों को सहकर ही
पत्थर मूरत है बनता ,
अग्नि में तपकर ही
कंचन कुंदन में ढलता ।

जीत की वरमाला में
पुष्प जो है सजते ,
खुद में छिद्र करने से
वो कभी ना डरते ।

आज तेरे जो गम है
कल की खुशियाँ बनेंगे,
पलकों के ये आँसू
मोती बन फिर झरेंगे ।

गम है या ये है खुशियाँ
मन ही तेरा तो कहता ,
मन को जो तू समझ ले फिर
दोनों में कोई ना रहता ।

निशांत चौबे ‘ अज्ञानी’
२५.०७.२०१४

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