खोज

हर राह की है एक ही मंजिल
पहले तू किसी राह पर चल ,
आखिर कब तक रहेगा बैठा
अपनी खोज में जरा निकल ।

परिवर्तन ही बस अटल यहाँ पर
बाकि सब कुछ बदल जाएगा ,
उनके पीछे भाग के पगले !
आखिर क्या कुछ तू पाएगा ।

क्यूँ किसी कारण के भीतर
अपनी ख़ुशी को तू ढूंढे है ,
जिसका कोई भी कारण नहीं
उसका कारण तू पूछे है ।

क्यूँ हर परिस्थिति पर तू
अपना नियंत्रण चाहता है ,
क्यूँ दूसरों की सोच में तू
हमेशा कमियाँ निकालता है ।

मन में उठते तूफानों को
अपने नियंत्रण में कर ले ,
अपनी सोच की कमियाँ हटा
जीवन खुशियों से भर ले ।

उलझती हुई राहों में
भटकती हुई निगाहों में ,
एक पथ्य निर्धारित कर अपना
एक लक्ष्य निर्धारित कर अपना ।

आहुतित कर स्वयं को उसमें
तब जीवन साकार बनेगा ,
परिष्कृत जब तक विचार ना होंगे
सुख-दुःख का व्यापार रहेगा ।

खुशियों का कोई कारण नहीं
ना कभी गमों का है होता ,
जिसपर हँसता एक जीवन यहाँ
ठीक उसी पर दूजा है रोता ।

उद्देश्य अगर है खुशियाँ पाना
तो खत्म कर दे तू उनका कारण ,
हर पल में जीवन डाल कर ही
मिलेगा तुझे दुखों से निवारण ।

निशांत चौबे ‘अज्ञानी’
०७.०१.२०१७

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nishantchoubey

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