क्या तुम मुझे मिटा दोगे ?

मत समझो मुझे तुम
किताब के ऊपर पड़ी धूल
जिसे एक फूँक मारकर
तुम उड़ा दोगे ,
मैं तो किताब का लिखा
हर एक शब्द हूँ
इतनी आसानी से नहीं मुझे
तुम हटा दोगे।

मत समझो मुझे तुम
घर के कोने में रखा
एक दीपक
जिसे हवा के एक झोके से
तुम बुझा दोगे ,
मैं तो
अपने समय का सूर्य हूँ
खुद ही सोचों कि
क्या इतनी हैसियत है तुम्हारी
कि मुझे
तुम मिटा दोगे ?

मत समझो मुझे तुम
जल की एक नन्ही बूँद
जिसे एक चिंगारी की तपिश से
तुम सुखा दोगे ,
मैं तो
स्वयं एक समुद्र हूँ
सोचकर हँसी आती है कि
तुम समझते हो
इस चिंगारी से मुझे
तुम डरा दोगे ।

यह अहम नहीं
स्वयं पर विश्वास है
कि इतनी भी सस्ती नहीं हस्ती हमारी
कि तुम इसे मिटा दोगे ,
मैं तो
स्वयं काल का विधान हूँ
मुझसे ही बनते – मिटते है सब
और तुम सोचते हो
कि तुम
मुझे मिटा दोगे ?

निशांत चौबे ‘ अज्ञानी’
२८,०५,२०२१

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