क्या चलना छोड़ दूँ ?

अभी गिरा हूँ ,आगे शायद और भी गिरूँगा
तो क्या चलना छोड़ दूँ ?
अभी हारा हूँ , आगे शायद और भी हरूँगा
तो क्या लड़ना छोड़ हूँ ?

इस बार नहीं तो अगली बार सही
अपनी मंजिल मैं पा लूँगा ,
इस बार नहीं तो अगली बार सही
अपनी जीत पर मुस्कुरा लूँगा ।

लेकिन चलूँगा तभी तो
मंजिल मुझे नज़र आएगी ,
और लड़ूँगा तभी तो
जीत अपने पास बुलाएगी ।

मुझे चलना है , मुझे लड़ना है
मुझे जीवन पर्वत चढ़ना है ,
कभी धुप खिले या छाँव मिले
मुझे नित निरंतर बढ़ना है ।

मेरी गति मेरा परिचय
दुनिया से अब कराती है ,
मेरी मति मेरी दुनिया
अपने अनुरूप चलाती है ।

जब गति भी मेरी और मति भी मेरी
तो क्यूँ ना इसे निर्बाध बहने दूँ ,
जीवन की इस अग्निपथ पर
मुस्कुरा यूँही स्वयं को चलने दूँ ।

निशांत चौबे ‘अज्ञानी’
२१.०६.२०१८

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