कस्तूरी को ढूँढ़े

कस्तूरी को ढूँढ़े
मृग वन वन में ,
पर रहता है वो
उसके ही तन में ।

फिर काहे की दुविधा
फिर कैसी परेशानी ,
पास में तेरे सब कुछ है फिर
क्यों करता नादानी ।

छोटी सी ये दुनिया
छोटा सा ये जीवन ,
बीती जाये रैना
कुछ तो कर अब अर्पण ।

किसके पीछे भागे
क्या सोचे पछताए ,
जो कुछ पास में तेरे
उसको भी तो गवाए ।

जरा साँस तू ले ले
सोच कहाँ है जाना ,
क्या कुछ तूने खोया
क्या तुझे है पाना ।

ये पल फिर ना होंगे
जी ले हर एक पल तू ,
क्यों बैठा है ऐसे
मंजिल तक अब चल तू ।

एक है तेरा जीवन
एक है इसकी जवानी ,
तकदीर को क्यों कोसे
लिख अब अपनी कहानी ।

सब कुछ तेरे कारण
सब कुछ तुझसे होता ,
सब कुछ तू ही करता
फिर क्यों तू है रोता ।

अपने भीतर झाँको
अपने को तुम जानो ,
हनुमत जैसे खुदकी
क्षमता तुम पहचानो ।

समय चलता जाए
जीवन ढलता जाए ,
उसका ही है जीवन
जो खुद को अपनाए ।

निशांत चौबे ‘ अज्ञानी’
२३.११. २०१३

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nishantchoubey

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