कर रहा प्रयत्न हूँ कि

कर रहा प्रयत्न हूँ कि
जोत अपने भीतर मैं जलाऊँ,
सूर्य जब थक जाए तो
कुछ प्रकाश मैं भी फैलाऊँ ।

अँधेरा बहुत फैला घना है
दूर उसे कुछ कर पाऊँ ,
निज तप निज तेज से
पथ कुछ प्रज्ज्वलित मैं कर जाऊँ ।

कर रहा प्रयत्न हूँ कि
भाव जलाशय मैं एक बनाऊँ ,
बंजर हो चुके हृदयों में
अमृत बूंदे मैं कुछ पहुँचाऊँ ।

प्यास सर्वत्र फैली हुई है
तृप्त कंठ कुछ मैं कर पाऊँ ,
लाखों के लिए ना सही
किसी एक के तो मैं काम आऊँ ।

कर रहा प्रयत्न हूँ कि
यज्ञाग्नि ऐसी मैं एक जलाऊँ ,
भस्म हो सब विकार मेरे
शुद्धि स्वयं की मैं कर पाऊँ ।

जीवन सौभाग्य जो मिला है मुझको
सार्थक उसे मैं कुछ कर पाऊँ ,
मृत्यु के समय अमरत्व की
चादर ओढ़ यहाँ से मैं जाऊँ ।

निशांत चौबे ‘अज्ञानी’
२१.०६.२०१८

About the author

nishantchoubey

Hi! I am Nishant Choubey and I have created this blog to share my views through poetry, art and words.

View all posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *