कब कहा मैंने

कब कहा मैंने कि आसान होंगी राहे ,
स्वागत करेगी तेरा वो फैला अपनी बांहे ।

कुछ पाने के लिए कुछ खोना है पड़ता ,
जीवन का दीप हमेशा मृत्यु से है लड़ता ।

महलो का रास्ता तो वनों से हो गुजरता ,
अनेको प्रहार सहकर ही मूरत है उभरता ।

फिर क्यूँ कष्टों के साये से डरकर ,
हार मान लेते हो बिना उनसे लड़कर ।

पाना चाहते हो बहुत बिना कुछ भी खोए ,
फल आखिर मिलता कहाँ बिना बीज के बोए ।

जितना ऊँचा लक्ष्य होगा उतनी ही परेशानियाँ ,
युद्ध में देनी ही पड़ती अनेको कुर्बानियाँ ।

मंजिल की खुशियाँ पाना चाहते हो अगर ,
तय करना ही पड़ेगा काँटों से भरा डगर ।

बहुत आसान है मान जाना हार ,
जीतने वाला ही करता है आखिरी वार ।

घनघोर अँधेरे में सिर्फ एक दीप ही पर्याप्त है ,
किससे आस लगाए बैठा सब तुझमें ही व्यापत है ।

एक कदम हिम्मत से रख तो सही ,
राह की दुश्वारियां मिट जाएगी सभी ।

कष्टों के समक्ष अपने लक्ष्य का ध्यान कर ,
जीवन में अपने तू साहस का प्राण भर ।

निशांत चौबे ‘ अज्ञानी ‘
०९.१०.२०१४

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