ओ साथियाँ

चाँद जमीं पर कैसे उतर है आया
आँखों ने मेरे मुझको क्या है दिखलाया ,
कैसे यकीं कर लूँ आँखों पे अपने
सामने आयी तुम जैसे हो सपने,
सावन की बूंदे मन को भिंगाए
इंद्रधनुष में नज़र तू ही आए ।
ओ साथियाँ …

आँखों को तेरी जब भी मैं देखूँ
अपनी छवि को उसमें मैं ढूंढूँ ,
होठों की तेरी एक हँसी से
झूमे मेरा दिल गाए ख़ुशी से ,
वर्षा भरी जिनमें बादल हो जैसे
केश तुम्हारे लगते है वैसे ।
ओ साथियाँ …

बातें तुम्हारी मिश्री की डलियाँ
कोमल हो इतनी जितनी है कलियाँ ,
तन से भी सुन्दर मन है तेरा
उसपे निसार है जीवन मेरा ,
हाथों में तेरा ये हाथ मिलाकर
यूँही रखूँगा मैं दिल से लगाकर ।
ओ साथियाँ …

निशांत चौबे ‘अज्ञानी’
२२.०५.२०१७

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