उठो ! कि आज तुम्हारा है

उठो ! कि आज तुम्हारा है
कल था , कल होगा पर आज है
चारो दिशाओ से गूँजती आवाज़ है
उठो ! कि आज तुम्हारा है ।

कल का अफ़सोस , कल का सपना
दोनों में कोई ना अपना ,
बस आज पर ही अधिकार है
बाकि साडी उलझने बेकार है ,
आज ही मात्र सहारा है
उठो ! कि आज तुम्हारा है ।

पल-पल बदलते इस पल में
जो कभी ना आया उस कल में ,
क्यूँ सर झुकाये तू बैठा है
किस्मत का हवाला दे ऐंठा है,
तेरा आज ही तेरा कल बनाएगा
फिर कहाँ तू ये पल बिताएगा ,
समय ने आज तुझे ललकारा है
उठो ! कि आज तुम्हारा है ।

अपनी प्रतिभा का अब परिष्कार करो
स्वयं अपना अब आविष्कार करो ,
तुम किसी के मोहताज नहीं
जीवन तुम्हारा कोई मजाक नहीं ,
नयनो में फिर क्यूँ अश्रुधारा है
उठो ! कि आज तुम्हारा है ।

मात्र मिटटी के ढेले नहीं
तुम एक कोहिनूर हो ,
खुदा ने दुनिया को बक्शा
तुम ऐसी एक नूर हो ,
अपना जन्म अब साकार करो
दुनिया पर कोई उपकार करो ,
आज तुमने खुदको स्वीकारा है
उठो ! कि आज तुम्हारा है ।

निशांत चौबे ‘ अज्ञानी ‘
२६.०५.२०१३

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